Thursday, May 29, 2008

मैंने सीखा या ज़िंदगी ने सिखा दिया?

जो पैर के नीचे से ज़मीं खिसक जाए तो परवाह नहीं

मैंने भी उड़ना सीख लिया है



जो हमसफ़र साथ ना चले तो कोई फिक्र नहीं

मैंने भी अकेले सफर करना सीख लिया है



जो वो पीठ पर खंजर चलायें तो कोई बात नहीं

मैंने भी पलट कर अपना सीना आगे करना सीख लिया है

4 comments:

पी के शर्मा said...

वाह क्‍या बाता है

शोभा said...

अजय जी
बहुत सुन्दर लिखा है-
जो पैर के नीचे से ज़मीं खिसक जाए तो परवाह नहीं
मैंने भी उड़ना सीख लिया है
यही जीबन स्वर होना चाहिए।

Batangad said...

क्या बात है

Ajay Dubey said...

Thank you Shobha Ji, Pawan Ji and Harshvardhan ji.