Tuesday, July 1, 2008

इस समय एक घर की खिड़की से

शाम का वक्त

उदास मन

घनघोर काले बादल

रिम-झिम बारिस

मैदान में खेलने को बेताब बच्चों की आवाज़

बारिस से बचते जल्दबाजी में घर लौटते पंछी

खिड़की से आते हवा के झोंके साथ पानी की कुछ बूंदे लिए

पुरानी यादें कुछ ऐसे सामने आयीं

और फिर याद दिला गयीं कि कितना बेमानी था वो वक्त

और सब पुरानी नई यादें

कुरेद कर चली गई सारे ताज़ा ज़ख्मों को मेरे

कोई मेरे दर्द को क्यों नहीं समझता

कितना मुश्किल है किसी और की मौजूदगी के साथ रहना

कितना मुश्किल है किसी की दूसरी पसंद बन कर रहना

कितना मुश्किल है वो सारे आधे सच और आधे झूट के साथ रहना

कितना मुश्किल है इक बार और बार बार धोखा खाने के बाद भरोसा करना

मुझसे जो बन पड़ा मैंने किया, अपने से ही हर पल जूझता रहता हूँ, टूटता रहता हूँ और समेटता रहता हूँ

Thursday, May 29, 2008

मैंने सीखा या ज़िंदगी ने सिखा दिया?

जो पैर के नीचे से ज़मीं खिसक जाए तो परवाह नहीं

मैंने भी उड़ना सीख लिया है



जो हमसफ़र साथ ना चले तो कोई फिक्र नहीं

मैंने भी अकेले सफर करना सीख लिया है



जो वो पीठ पर खंजर चलायें तो कोई बात नहीं

मैंने भी पलट कर अपना सीना आगे करना सीख लिया है

Thursday, May 22, 2008

उनकी कविता

मैंने जब उनकी कविता "फिर से जीने को दिल करता है" देखी
मेरा दिल खुश हुआ
पर ये जाना की वो कविता मेरे/हमारे सदर्भ मे थी ही नहीं
दिल ऐसा टुटा की फिर जुड़ने की उम्मीद नहीं है
कोशिश करता रहूंगा आपने वजूद को संभाल कर रखने की
क्योंकि कुछ और मासूम जिंदगियाँ जुड़ी हैं अपने साथ

रिस्ते

रिस्ते सिर्फ़ खून के तोड़े नहीं जा सकते;

बाकी सभी रिश्ते बनाये या तोड़े जा सकते हैं;

ये और बात है की सभी रिस्ते निभाए जा सकते हैं और नहीं भी;