शाम का वक्त
उदास मन
घनघोर काले बादल
रिम-झिम बारिस
मैदान में खेलने को बेताब बच्चों की आवाज़
बारिस से बचते जल्दबाजी में घर लौटते पंछी
खिड़की से आते हवा के झोंके साथ पानी की कुछ बूंदे लिए
पुरानी यादें कुछ ऐसे सामने आयीं
और फिर याद दिला गयीं कि कितना बेमानी था वो वक्त
और सब पुरानी नई यादें
कुरेद कर चली गई सारे ताज़ा ज़ख्मों को मेरे
Tuesday, July 1, 2008
कोई मेरे दर्द को क्यों नहीं समझता
कितना मुश्किल है किसी और की मौजूदगी के साथ रहना
कितना मुश्किल है किसी की दूसरी पसंद बन कर रहना
कितना मुश्किल है वो सारे आधे सच और आधे झूट के साथ रहना
कितना मुश्किल है इक बार और बार बार धोखा खाने के बाद भरोसा करना
मुझसे जो बन पड़ा मैंने किया, अपने से ही हर पल जूझता रहता हूँ, टूटता रहता हूँ और समेटता रहता हूँ
कितना मुश्किल है किसी की दूसरी पसंद बन कर रहना
कितना मुश्किल है वो सारे आधे सच और आधे झूट के साथ रहना
कितना मुश्किल है इक बार और बार बार धोखा खाने के बाद भरोसा करना
मुझसे जो बन पड़ा मैंने किया, अपने से ही हर पल जूझता रहता हूँ, टूटता रहता हूँ और समेटता रहता हूँ
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