Tuesday, July 1, 2008

इस समय एक घर की खिड़की से

शाम का वक्त

उदास मन

घनघोर काले बादल

रिम-झिम बारिस

मैदान में खेलने को बेताब बच्चों की आवाज़

बारिस से बचते जल्दबाजी में घर लौटते पंछी

खिड़की से आते हवा के झोंके साथ पानी की कुछ बूंदे लिए

पुरानी यादें कुछ ऐसे सामने आयीं

और फिर याद दिला गयीं कि कितना बेमानी था वो वक्त

और सब पुरानी नई यादें

कुरेद कर चली गई सारे ताज़ा ज़ख्मों को मेरे

1 comment:

E-Guru Maya said...

ये एक लाइन की कवितायें भी :)
गद्य शैली का अपना ही रस होता है.